हिमालय की गोंद में (हृषिकेश, हरिद्वार भ्रमण )

हरिद्वार और हृषिकेश का नाम मन में आते ही एक मनोरम चित्रण आँखों के सामने उभर जाता है –

  • आसमान को छूती पहाड़ो की चोटिया और उसपर डूबता हुआ केसरिया सूरज
  • ढलान से निचे की ओर तेज गति से बहती हुई गंगा और उसमे नौकाविहार करते हुए लोग
  • झूले द्धारा पहाड़ो पर जाते हुए निचे का दृश्य
  • बारिश के बाद आसमान में एक साथ दो-दो इंद्रधनुष का दिखना

इस तरह के अनेकानेक रमणीक चित्र मन को बार बार ऋषिकेश की ओर उद्धेलित करते है|

पिछले ५ साल से होली तथा अन्य खास पर्व के मौको पर घर से दूर रहने के कटु अनुभव ने हमारे अंदर के रसिकपन(प्रकृति से लगाव) को मृतप्राय कर दिया है | ऐसे में हरिद्वार यात्रा ने इस में प्राण डालने का काम किया, एक बार फिर से मन में बनावटी खूबसूरती को छोड़ प्रकृति की तरफ मुड़ने की उत्कंठा जगी |

March 11, 2017-

मैंने अपने ३ अन्य साथियो करन, प्रिंस और परिमल के साथ मिलकर हरिद्वार और ऋषिकेश जाने का योजना बनाया और हम १० तारीख की रात को लुधियाना से हरिद्वार के लिए ट्रैन पकड़े, ट्रैन में हमें तीन और दोस्त(अनूप, सनकादिक, और सोनू) मिले जो उसी ट्रैन से हरिद्वार घूमने ही जा रहे थे, हम सुबह के ७ बजे हरिद्वार पहुचे |
फिर हमने ठहराने के लिए होटल ढूढा |यहाँ मैं अपने आप को होटल का वर्णन करने से नहीं रोक सकता हु क्योंकि मैंने उत्तर भारत के जितने भी पर्यटक स्थलों को घुमा है मुझे इससे साफ़ और सस्ता होटल कही नही मिला | उस होटल के खाने का क्या कहना आप एक बार खा ले तो फिर बाहर खाने का नाम भी न ले |

सुबह के १० बजे तक हम तैयार हो कर हरिद्वार घूमने निकल चुके थे |
सब से पहले हम माता मनसा देवी के दरबार में पहुचे फिर वह पूजा-अर्चना करने के बाद हम माता चंडी के दरबार में पहुचे, ये दोनों ही स्थान माता सती के शक्तिपीठो में से एक है | निचे से पहाड़(दरबार) तक पहुचने के लिए हमें दोनों जगहों पर झूलो वाले रास्ते से जाना पड़ा क्योंकि माता चंडी के दरबार में जाने के लिए कोई और रास्ता नहीं था | झूलो पर से निचे का दृश्य अविस्मरणीय था |

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A Pic form the Mountain of Mata Chandi Devi

पहाड़ को ऊपर से देखने का ये दृश्य मन को आनंद के सागर में डुबो रहा था |मानो हम में उड़ने की शक्ति आ गयी हो और हम खुलो मन से अपने मनचाहे जगह पर विचरण कर रहे हो |

हम दिन के १ बजे तक इन जगहों को घूम चुके थे | अतः अब हम शांतिकुंज की तरफ बढे | शांतिकुंज में पहुच कर लगा हम एक अलग दुनिया में ही आ चुके है , एक अप्रतिम शांति का अनुभव हो रहा था चारो तरफ भांति-भांति के फूल और आयुर्वेदिक औषधियो के पौधे लगे हुए थे | हर तरफ बच्चे से लेकर बूढ़े तक सेवा के कार्य में तन मन से लगे हुए थे, कुछ लोग लंगर के कार्य में व्यस्त थे तथा कुछ लोग धयान लगा रहे थे, सब के चेहरे पर एक अजीब सा संतोष और शांति था जो हमें परेशान कर रहा था की ये हम से ज्यादा सुखी कैसे है जब की इन के पास हम से कम सुविधा है | परंतु एक पंक्ति जो हम बचपन से पढ़ते आ रहे है “संतोषम परम सुखं” आज चरितार्थ नजर आ रहा था |

 

इस के बाद हम भारत माता मंदिर पहुचे जहा हमने माँ भारती के चरण स्पर्श किये तथा महापुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त किया | भारत माता मंदिर में हमें प्राचीन भारत से लेकर आधुनिक भारत तक की एक झलक मिलती है जो परम सुन्दर है | यहाँ के देवता हमारे भारतवर्ष के महान लेखक, कवी, दार्शनिक तथा आज़ादी के नायक है, मई हर भारत वासी को इस मंदिर को देखने के लिए जरूर प्रेरित करूँगा |

शाम के ५ बज चुके थे, हल्की-हल्की बूंदी-बांदी भी हो रही थी जिसके वजह से आसमान में इंद्रधनुष निकल पड़े थे | एक साथ दो-दो इंद्रधनुष देखने का मौका पहली बार मिला था जो की बहुत ही आनंदायी था | गंगा के किनारे खड़ा होकर महादेव के समक्ष इंद्रधनुष का दृश्य परम आनंदायी था |

हमने शाम के ६ बजे के गंगा आरती में सम्मिलित होने का योजना बनाया परंतु जब तक हम वहा पहुंचे आरती ख़तम हो चुकी थी |
अतः हमने गंगा घाट पर ही आज का शेष समय गुजारा | दिन भर के थकान के बाद जब हम रूम पर पहुचे और खाने के बाद बिस्तर पर पड़े तो हमें पता ही नहीं चला कब सुबह के ८ बज गए |

March 12, 2017-

आज हम जल्दी होटल से निकले ताकि ऋषिकेश पहुचने में देर न हो, हमने बाहर टैक्सी को बुलाया और ऋषिकेश को हो लिए | हरिद्वार से ऋषिकेश का यात्रा बमुस्किलन ३०-३५ मिनट का है | हमने ऋषिकेश पहुच कर सबसे पहले ‘लक्ष्मण झूला’ देखा कुछ बहुत ज्यादा खास तो नहीं था परंतु एक खास बात थी की ओ बिना किसी निचले सहयोग के गंगा नदी को मिलता था | हालाँकि यह वास्तविक लक्षमण झूला नही था परंतु उसे देख कर ऐसा लग रहा था की वास्तविक झूला कही बेहतरीन रहा होगा |

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हम जल्द ही लक्षमण झूला से आगे बढ़े और फिर थोड़ी देर तक आसपास घूमे उसके बाद हमने निर्णय किया की अब नौकाविहार(राफ्टिंग) करना चाहिए |
हम दोपहर १ के आसपास राफ्टिंग की बुकिंग किये परंतु नदी के तट तक पहुचने में २:३० के आसपास का समय होने लगा | उफनती नदी में औरो को नौकाविहार करते देख मन ज्यादा तेजी से राफ्टिंग की तरफ झुकने लगा | अब तक जो डर था सब के मन में नदी की गहराई से ओ अब क्षणभंगुर हो गया अब मन बस नदी में उत्तर जाने को कर रहा था परंतु नाविक था की नियम-कायदे की कसीदे पढाये जा रहा था, खैर ओ बहुत ही जरूरी था , हमारे जोश से भी ज्यादा | अंततः उसने हमें नाव में बिठाया और चप्पू हमारे हाथो में दे दी अब हमारे खुसी का कोई ठिकाना न था, हम ओ बच्चे बन गए थे जिसके लिए खिलौने से बढ़ कर कुछ नहीं | नदी में जब तेज धारा के साथ उछाल आता तो सब के मुख पर एक मरा हुआ डर और जीवंत मुस्कान चमक उठती थी |

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अब बिच धारा में सबका मन गंगा स्नान का करने लगा तो आधा दुरी तय करने के बाद नाविक ने नाव को रोक कर हमें नदी में कूदने की अनुमति दे दी मैं इसी मौके की तलाश में था और तुरंत ही नदी में कूद गया साथ में परिमल भी कूदा पर ओ जल्द ही बाहर निकल गया क्योंकि ठण्ड बहुत ही ज्यादा था मैं थोड़ा देर स्नान करने के बाद बाहर निकला | तेज हवा और छाया के वजह से ठण्ड काफी ज्यादा लग रहा था | १० किमी (जैसा की नाविक ने बताया) कि दुरी धारा के साथ तय करने में हमें १:३० से १:४५ घंटे लगे उसके बाद हम बाहर आकर गर्म कपडे पहने और फिर ऋषिकेश की बाज़ारो में फिर से घूमने निकले |

दिन भर के थकान एवं नौकाविहार के कारण अब हमें भूख बहुत जोरो से लग चुकी थी | हमने वही पास में एक समोसे वाले के दुकान से समोसे मंगाए और उसके हॉल में खाने बैठे, मैं और करन साथ में बेंच पर बैठ गए तथा परिमल और प्रिंस पास में ही खड़े होकर समोसे खाने लगे क्योंकि दोनों बेंचो पर कुल जगह चार लोगो के बैठने की ही थी जिसमे से मैं और करन एक तरफ के बेंच पर बैठे हुए थे और विपरीत दिशा वाले बेंच पर एक विदेशी महिला बैठी हुई थी |
एक बची हुई जगह पर हम बैठने के लिए बोलने वाले ही थी की इतने में एक ३५ वर्ष का नौजवान वहाँ आकर विदेशी महिला के बगल में बैठ गया |

हम आपस में गप्पे लड़ाई जा रहे थे की इतने में ओ बोल पड़ा :
नौजवान -कैसे आना हुआ?
करन – बेशक, घूमने ही आये है
नौजवान – घूम लिए ?
मैं – हां जी
नौजवान – कहा से है?
मैं -बिहार से, और आप?
नौजवान – उ.प. से, वैसे आप लोग करते क्या है ?
करन -इंजीनियरिंग
नौजवान -किस कॉलेज से, और ब्राँच क्या है ?
मैं – गुरु नानक देव इंजीनियरिंग कॉलेज लुधियाना से कंप्यूटर इंजीनियरिंग
नौजवान -अच्छा, तो प्लेसमेंट कैसा है?( एक चिरपरिचित प्रश्न, जैसा की हम किसी भी भारतीय से अपेक्षा कर सकते है)
मैं -हालांकि हम इस प्रश्न का जबाब देने में थोड़ा असहज महसूस कर रहे थे क्योंकि हमें हमारी भी औकात अच्छे से पता है , खैर मैंने बोला की अच्छा है परंतु बहुत अच्छा भी नहीं है- औसत रूप से हर कंप्यूटर वाले बन्दे को जिसकी की नंबर हर सेमेस्टर में अच्छे हो नौकरी तो मिल जाती है फिर चाहे ओ टीसीएस से हो एक्सेंचर से हो या फिर इनफ़ोसिस से हो |
नौजवान -तो फिर आपका क्या प्लान है ?
मैं – ये तो पिछले वाले से भी खतरनाक था, इतना एनकाउंटर तो मेरे माता-पिता और शिक्षको ने भी नहीं किया था, खैर करन ने टालने के ध्येय से बोल दिया -कुछ खास अभी सोचे नहीं है(बिलकुल सटीक जबाब था यही तो हम करते आये है) |
नौजवान -तो भी इंजीनियरिंग के बाद भारत में ही रहना है?
करन -(हा ये प्रश्न मजेदार था) हा रहना तो भारत में ही है
नौजवान -भारत में रह के क्या करोगे टीसीएस में जॉब ?
इतने में प्रिंस भी साथ में हो लिया
प्रिंस -टीसीएस में ही क्यों बहुत सारी और भी कंपनिया है बाकि आपके प्रतिभा पर निर्भर करता है, आप अपना स्टार्टअप खोल सकते है या फिर किसी स्टार्टअप में काम कर सकते है|
नौजवान -अच्छा, मोदी भक्त हो ?
मैं -(हालाँकि ये किसी भी तरह से योग्य प्रश्न नहीं था) जी हा भक्त तो हम है
नौजवान -अच्छा, फिर तो देशभक्ति भी होगी
मैं -जी ये भी कोई पूछने वाली बात है
नौजवान -(भड़कते हुऐ) अच्छा ये बताओ की मोदी ने ऐसा क्या किया है , क्या जो १०४ सेटेलाइट लांच हुऐ है ओ मोदी ने किया था, या फिर विमुद्रीकरण सफल रहा, मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया, विदेश-यात्रा ………….वगैरह वगैरह ???
मैं -हा जी ये सारे काम तो हुऐ ही है चाहे आप मानो या न मानो कम से कम रिपोर्ट तो पढ़ लो
नौजवान -(और ज्यादा भड़कते हुऐ) अच्छा एक भी कंपनी का नाम बता दीजिये जो ‘मेक इन इंडिया’ या फिर ‘मेड इन इंडिया’ के तहत भारत में काम कर रही हो?
मैं -(अब तक लगाने लगा था की ये बंदा बिना काम का ही है फिर भी) चलिए इतना बता दे रहा हु की सिओमी(mi) अब अपना फोन भारत में ही बनाती है |
नौजवान -(और भड़कते हुऐ) मैंने २००५ में लवली विश्वविद्यालय से मैकेनिकल से ऍम-टेक किया था परंतु मुझे आज तक नौकरी नहीं मिली.
मैं -मन में ही सोच रहा था तो असली वजह ये है पर बात तो २००५ की है, परंतु मैंने जखमो पर नमक रगड़ना उचित नहीं समझा | अब तक नौजवान के प्याली की चाय खत्म हो चुकी थी इसलिए ओ जाने के लिए उठ खड़ा हुआ और साथ ही साथ हमारे पैसे भी खुद ही चुकाने लगा परंतु हमने उन्हें रोक दिया, आखिर बेरोजगारों की जेब क्यों खाली करते |
 

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Published by: ranjeetkumarmaurya

I am a student of 3rd year (CSE) from Guru Nanak Dev Engineering College Ludhiana. I am working on Android and Java Programming. I like Sports like Cricket, Badminton, Football and also track games.

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